पश्चिम बंगाल की सत्ता पर टकराव… हार के बाद भी पद नहीं छोड़ेंगी ममता? जानिए क्या कहता है संविधान

 पश्चिम बंगाल :  विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद बड़ा राजनीतिक घमासान देखने को मिल रहा है। ममता बनर्जी ने हार के बावजूद मुख्यमंत्री पद छोड़ने से इनकार कर दिया है। उनका आरोप है कि चुनाव प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं रही और इसके लिए उन्होंने भारत निर्वाचन आयोग को जिम्मेदार ठहराया है।

क्या इस्तीफा जरूरी है? यहां समझिए पूरा संवैधानिक गणित
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर मौजूदा मुख्यमंत्री इस्तीफा नहीं देते, तो क्या नई सरकार का गठन रुक सकता है? संवैधानिक विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसा नहीं है। मुख्यमंत्री का पद सीधे तौर पर विधानसभा के बहुमत से जुड़ा होता है, न कि केवल व्यक्ति की इच्छा से।

कार्यकाल पूरा होते ही बदल जाता है सत्ता का अधिकार
जानकारों के अनुसार, जैसे ही मुख्यमंत्री का पांच साल का कार्यकाल समाप्त होता है, पद स्वतः ही प्रभावहीन हो जाता है। इसके बाद नई सरकार बनाने का अधिकार उस दल को मिलता है, जिसे स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ हो। ऐसे में राज्यपाल नई सरकार के नेता को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला सकते हैं, चाहे मौजूदा मुख्यमंत्री इस्तीफा दें या नहीं।

राज्यपाल की भूमिका बनती है निर्णायक
संविधान के तहत मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल के पास होता है। यदि बहुमत स्पष्ट हो और चुनाव परिणाम घोषित हो चुके हों, तो राज्यपाल नई सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। इसमें पुराने मुख्यमंत्री की सहमति जरूरी नहीं होती।

अगर टकराव बढ़े तो लागू हो सकता है राष्ट्रपति शासन
ऐसी स्थिति में यदि संवैधानिक संकट उत्पन्न होता है या सत्ता हस्तांतरण में बाधा आती है, तो अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन की सिफारिश भी की जा सकती है। यह कदम तब उठाया जाता है जब राज्य में संवैधानिक व्यवस्था प्रभावित होने लगती है।

अंतिम फैसला बहुमत और संविधान के आधार पर
पूरे घटनाक्रम में यह साफ है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अंतिम फैसला जनता के जनादेश और संवैधानिक प्रावधानों पर निर्भर करता है। ऐसे में नई सरकार के गठन की प्रक्रिया कानूनी ढांचे के भीतर ही आगे बढ़ेगी, चाहे राजनीतिक बयानबाजी कितनी भी तेज क्यों न हो।

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