बिलासपुर कांग्रेस में बढ़ी अंदरूनी खींचतान: नए जिला अध्यक्षों के सामने पुराने नेताओं की चुनौती, संगठन में दिखने लगी गुटबाजी

रायपुर। कांग्रेस के संगठन सृजन अभियान का उद्देश्य पार्टी को मजबूत करना और नई पीढ़ी के नेताओं को आगे लाना था। लेकिन छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में यही बदलाव अब नए विवाद की वजह बनता दिखाई दे रहा है। नए जिला अध्यक्षों की नियुक्ति के बाद संगठन में पुराने और नए नेताओं के बीच खींचतान खुलकर सामने आने लगी है, जिससे स्थानीय स्तर पर पार्टी की एकजुटता पर सवाल उठ रहे हैं।

नए अध्यक्षों के सामने बड़ी चुनौती

विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस ने बिलासपुर शहर जिला कांग्रेस की कमान सिद्धांशु मिश्रा और ग्रामीण जिला कांग्रेस का नेतृत्व महेंद्र गंगोत्री को सौंपा। हालांकि पदभार संभालते ही दोनों नेताओं को गुटीय राजनीति का सामना करना पड़ा। संगठन की नई कार्यकारिणी तैयार करने में भी कई महीने लग गए, जिससे अंदरूनी मतभेदों की चर्चा तेज हो गई।

धरना-प्रदर्शन में भी दिख रही अलग-अलग लाइन

पार्टी ने स्थानीय मुद्दों पर लगातार आंदोलन करने की रणनीति बनाई है, लेकिन बिलासपुर में कई कार्यक्रम अलग-अलग नेतृत्व में आयोजित होने लगे हैं। इससे कार्यकर्ताओं के बीच भी भ्रम की स्थिति बन रही है और संगठन की एकजुटता प्रभावित होती दिख रही है।

देवेंद्र यादव की सक्रियता बनी चर्चा का विषय

हाल के आंदोलनों के दौरान भिलाई विधायक देवेंद्र यादव की सक्रियता भी चर्चा में रही। राजनीतिक हलकों में इसे लेकर अलग-अलग तरह की चर्चाएं हैं। बताया जा रहा है कि कुछ स्थानीय नेताओं ने इस पर नाराजगी भी जताई, क्योंकि उनके अनुसार जिला स्तर के आंदोलनों में स्थानीय नेतृत्व को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी।

विजय केशरवानी की अलग सक्रियता से बढ़ी हलचल

पूर्व ग्रामीण जिला कांग्रेस अध्यक्ष विजय केशरवानी भी लगातार स्वतंत्र कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। खाद, बिजली और अन्य मुद्दों पर अलग प्रदर्शन करने के बाद अब उन्होंने राम मंदिर से जुड़े कार्यक्रम की घोषणा की है। इससे संगठन के भीतर नई बहस शुरू हो गई है कि पार्टी से जुड़े नेता यदि अलग मंच से कार्यक्रम करेंगे तो इसका संदेश कार्यकर्ताओं तक क्या जाएगा।

गुटबाजी से संगठन पर पड़ सकता है असर

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिलासपुर कांग्रेस में अलग-अलग गुटों की सक्रियता यदि इसी तरह जारी रही तो इसका असर संगठन की जमीनी मजबूती पर पड़ सकता है। आगामी चुनावों को देखते हुए पार्टी नेतृत्व के सामने सबसे बड़ी चुनौती सभी नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक मंच पर लाकर संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की होगी।

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