
बालोद : प्रेम प्रस्ताव ठुकराए जाने के बाद एक युवती पर एसिड फेंकने की घटना ने समाज को झकझोर दिया है। किसी लड़की के चेहरे पर तेजाब डालना केवल उसके शरीर को नुकसान पहुंचाना नहीं है, बल्कि उसके सपनों, आत्मविश्वास और भविष्य पर हमला करना है। यह घटना उस मानसिकता का भयावह चेहरा दिखाती है, जिसमें किसी महिला का फैसला स्वीकार करना आज भी कुछ लोगों के लिए असंभव है।
प्रेम में असफलता का बदला मासूम बच्ची से
यह पहली घटना नहीं है, जब किसी महिला के फैसले का बदला उसके किसी करीबी को निशाना बनाकर लेने की कोशिश की गई हो। कुछ दिन पहले एक व्यक्ति पर प्रेम में असफल होने के बाद एक महिला को परेशान करने के लिए उसकी चार साल की बच्ची के अपहरण का आरोप लगा। पुलिस की तत्परता से बच्ची सुरक्षित बरामद हो गई, लेकिन इस घटना ने बदले की उस सोच को सामने ला दिया, जिसमें एक मासूम को भी हथियार बना दिया जाता है।सोचिए, अगर वह बच्ची समय पर नहीं मिलती तो उसकी मां किस मानसिक पीड़ा से गुजरती। हर दिन उसके लिए डर और इंतजार में बदल जाता। एक व्यक्ति की सनक का बोझ आखिर उस महिला और मासूम बच्ची को क्यों उठाना पड़ता?
एसिड अटैक के बाद सिर्फ चेहरा नहीं बदलता, पूरी जिंदगी बदल जाती है
जिस युवती पर एसिड फेंका गया, उसके लिए चुनौती केवल इलाज तक सीमित नहीं होगी। उसे शारीरिक पीड़ा के साथ लंबे समय तक मानसिक और सामाजिक संघर्ष भी करना पड़ सकता है।उसकी पढ़ाई, नौकरी, रिश्ते, आत्मविश्वास और भविष्य के सपने तक प्रभावित हो सकते हैं। जिसने केवल किसी रिश्ते के लिए अपनी इच्छा बताई या उसे स्वीकार करने से इनकार किया, उसे इतनी बड़ी कीमत क्यों चुकानी पड़े?
पुरुष का अहंकार, लेकिन सजा महिला को क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब मानसिकता और अहंकार किसी पुरुष का है, तो उसकी सजा किसी निर्दोष महिला को क्यों मिलती है?क्या किसी लड़की को अपनी जिंदगी के बारे में फैसला लेने का अधिकार नहीं है? क्या वह किसी रिश्ते को स्वीकार या अस्वीकार नहीं कर सकती? उसका ना कहना किसी के सम्मान या पुरुषत्व पर हमला कैसे बन जाता है?एक महिला का इनकार अपमान नहीं है। वह उसका अधिकार है। उसे स्वीकार करना किसी भी स्वस्थ रिश्ते की पहली शर्त होनी चाहिए।
क्या यही प्रेम है, जिसकी हम मिसाल देते हैं?
हम प्रेम की बात करते समय राधा-कृष्ण, मीरा, राम-सीता और शिव-पार्वती जैसे उदाहरण देते हैं। इन कथाओं में प्रेम को समर्पण, विश्वास, त्याग और सम्मान से जोड़ा गया है।कहीं भी प्रेम का अर्थ किसी की इच्छा के खिलाफ उसे हासिल करना नहीं है। फिर ऐसा कौन सा प्रेम है, जिसमें इनकार के बाद तेजाब फेंका जाता है, अपहरण किया जाता है या जान लेने की कोशिश होती है?यह प्रेम नहीं, अधिकार जताने और बदला लेने की विकृत मानसिकता है।
कानून के साथ सोच बदलना भी जरूरी
कठोर कानून जरूरी हैं और ऐसे अपराधों में दोषियों को सख्त से सख्त सजा मिलनी चाहिए। लेकिन केवल कानून बदलने से समस्या खत्म नहीं होगी। बदलाव उस सोच में लाना होगा, जो बचपन से लड़कों को यह सिखाती है कि उन्हें हर हाल में अपनी पसंद हासिल करनी ही है।घर और समाज को बेटों को यह समझाना होगा कि प्रेम किसी व्यक्ति पर अधिकार नहीं देता। किसी लड़की का ना सुनना हार नहीं है। उसका फैसला उसकी स्वतंत्रता है और उसका सम्मान करना ही असली परिपक्वता है।
जिस दिन ना को ना की तरह स्वीकार किया जाएगा, उसी दिन प्रेम सुरक्षित होगा
जब तक इनकार को अपमान और अस्वीकार को बदले का कारण समझने वाली मानसिकता मौजूद रहेगी, तब तक किसी बेटी के चेहरे पर तेजाब और किसी मां की गोद में डर का खतरा बना रहेगा।जरूरत सिर्फ अपराध रोकने की नहीं, उस सोच को बदलने की है जो प्रेम को पाने की जिद में बदल देती है। क्योंकि सच्चा प्रेम किसी को हासिल करने की मजबूरी नहीं, उसकी इच्छा और स्वतंत्रता का सम्मान करने की क्षमता है।
यह विचार लेखिका नम्रता सिंह उर्मिला फाउंडेशन की है
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