बस्तर से राष्ट्रपति भवन तक का ऐतिहासिक रिश्ता, राजेंद्र प्रसाद से द्रौपदी मुर्मु तक 5 राष्ट्रपतियों ने दिया विकास का संदेश

जगदलपुर। बस्तर की धरती केवल प्राकृतिक खूबसूरती और समृद्ध जनजातीय संस्कृति के लिए ही प्रसिद्ध नहीं है, बल्कि देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तित्वों के दौरों की ऐतिहासिक गवाह भी रही है। आजादी के बाद से अब तक देश के पांच राष्ट्रपतियों के बस्तर आगमन का उल्लेख मिलता है। इन यात्राओं के दौरान शिक्षा, सामुदायिक सहयोग, स्वास्थ्य सेवाओं, पर्यटन और जनजातीय संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर जोर दिया गया।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु 23 अक्टूबर 2026 को अपने दूसरे बस्तर प्रवास पर ऐतिहासिक मुरिया दरबार में शामिल होने के लिए जगदलपुर पहुंच रही हैं। इससे पहले उन्होंने 7 फरवरी 2026 को बस्तर पंडुम में भाग लिया था। उनका मौजूदा दौरा बस्तर दशहरा की ऐतिहासिक परंपराओं और जनजातीय समाज की सांस्कृतिक पहचान के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

बस्तर के इतिहास में राष्ट्रपति के दौरों को देखें तो हर यात्रा का अपना अलग महत्व सामने आता है। किसी ने ग्रामीणों को सामूहिक प्रयासों के लिए प्रेरित किया, तो किसी ने शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय विकास की जरूरतों को रेखांकित किया।

1. डॉ. राजेंद्र प्रसाद: ग्रामीण विकास और श्रमदान का संदेश

23 मार्च 1953 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बस्तर का दौरा किया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल के साथ वे जगदलपुर के नजदीक एक गांव पहुंचे थे। बताया जाता है कि ग्रामीणों के निमंत्रण पर हुए इस दौरे में उन्होंने स्थानीय लोगों के प्रयासों से तैयार छात्रावास का उद्घाटन किया और कुएं के निर्माण के लिए भूमिपूजन किया।

इस यात्रा का प्रमुख संदेश सामुदायिक सहयोग और श्रमदान से विकास को गति देने का था। स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में देश के सामने ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं का विस्तार एक बड़ी चुनौती थी। ऐसे समय में राष्ट्रपति का ग्रामीणों के बीच पहुंचना और उनके सामूहिक प्रयासों को प्रोत्साहित करना विशेष महत्व रखता था।

उनका संदेश था कि समाज की प्रगति के लिए सरकारी योजनाओं के साथ नागरिकों की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है। यह सोच आत्मनिर्भरता, स्थानीय सहयोग और ग्रामीण विकास की भावना को मजबूत करने वाली थी।

2. डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम: शिक्षा और वैज्ञानिक सोच पर जोर

पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का बस्तर से जुड़ाव उनके राष्ट्रपति बनने से पहले भी रहा था। रक्षा वैज्ञानिक के रूप में उन्होंने इस क्षेत्र का दौरा किया था। गिरोला और मारडूम में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन से जुड़े केंद्रों की स्थापना के संदर्भ में भी उनकी भूमिका का उल्लेख मिलता है।

4 जून 2004 को राष्ट्रपति के रूप में वे तोकापाल क्षेत्र के रानसरगीपाल गांव पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने विद्यार्थियों और स्थानीय लोगों से संवाद किया तथा शिक्षा के महत्व पर जोर दिया।

डॉ. कलाम का मानना था कि किसी भी समाज का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी की शिक्षा, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और लक्ष्य हासिल करने के संकल्प पर निर्भर करता है। उन्होंने विद्यार्थियों को बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए निरंतर मेहनत करने की प्रेरणा दी।

बस्तर जैसे दूरस्थ क्षेत्र में उनका यह संदेश विशेष महत्व रखता था, जहां शिक्षा के अवसरों का विस्तार सामाजिक और आर्थिक बदलाव की दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है।

3. प्रतिभा पाटिल: पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण की संभावनाएं

देश की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने 29 सितंबर 2008 को बस्तर का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने विश्व प्रसिद्ध चित्रकोट जलप्रपात का भ्रमण किया और क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता को करीब से देखा।

चित्रकोट जलप्रपात और आसपास के प्राकृतिक परिवेश ने बस्तर में पर्यटन विकास की संभावनाओं को रेखांकित किया। इस क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ पर्यटन सुविधाओं का विस्तार स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है।

उनकी यात्रा से जुड़ा प्रमुख संदेश यह था कि प्राकृतिक धरोहरों की सुरक्षा और पर्यटन विकास को साथ लेकर आगे बढ़ना जरूरी है। बस्तर की पहचान केवल जंगलों और प्राकृतिक संपदा तक सीमित नहीं है। यहां की पारंपरिक कला, स्थानीय संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत भी पर्यटन को नई दिशा दे सकती है।

4. रामनाथ कोविंद: स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा को प्राथमिकता

पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 25 और 26 जुलाई 2018 को बस्तर का दो दिवसीय दौरा किया था। इस दौरान वे दंतेवाड़ा पहुंचे और मां दंतेश्वरी के दर्शन किए। उन्होंने चित्रकोट जलप्रपात का भी भ्रमण किया।

26 जुलाई को जगदलपुर के डिमरापाल स्थित स्वर्गीय बलीराम कश्यप स्मृति शासकीय मेडिकल कॉलेज परिसर में शहीद महेंद्र कर्मा स्मृति चिकित्सालय का लोकार्पण उनके दौरे का प्रमुख कार्यक्रम रहा।

इस अवसर पर स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार और शिक्षा को बेहतर बनाने की जरूरत महत्वपूर्ण विषयों में शामिल रही। दूरस्थ और जनजातीय क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराना विकास की बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है।

उनकी यात्रा ने इस बात को रेखांकित किया कि बस्तर के युवाओं को उच्च शिक्षा और व्यावसायिक प्रशिक्षण के बेहतर अवसर मिलने चाहिए। साथ ही, स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत करना भी क्षेत्र की प्रगति के लिए आवश्यक है।

5. द्रौपदी मुर्मु: जनजातीय विरासत और पारंपरिक व्यवस्था का सम्मान

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का बस्तर दौरा क्षेत्र की जनजातीय पहचान और सांस्कृतिक परंपराओं के लिहाज से विशेष महत्व रखता है। वे 7 फरवरी 2026 को बस्तर पंडुम में शामिल हुई थीं। अब 23 अक्टूबर 2026 को उनके दूसरे प्रवास में ऐतिहासिक मुरिया दरबार और बस्तर दशहरा से जुड़े कार्यक्रम प्रमुख हैं।

मुरिया दरबार बस्तर की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण आयोजन है। इसमें मांझी, चालकी और अन्य पारंपरिक जनजातीय प्रतिनिधि अपनी बात रखते हैं। ऐतिहासिक रूप से यह आयोजन बस्तर की पुरानी प्रशासनिक और सामाजिक परंपराओं से जुड़ा रहा है। वर्तमान समय में भी यह स्थानीय समाज और पारंपरिक प्रतिनिधियों के विचार सामने रखने का मंच है।

राष्ट्रपति मुर्मु की इसमें भागीदारी से जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक संस्थाओं के महत्व को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने का अवसर मिलेगा। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, सामाजिक भागीदारी और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे विषय इस क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

हालांकि, राष्ट्रपति अपने संबोधन में किन मुद्दों पर विशेष जोर देंगी, यह उनके कार्यक्रम के बाद ही स्पष्ट होगा।

मुरिया दरबार क्यों है बस्तर की विशिष्ट पहचान

बस्तर दशहरा देश के सबसे लंबे समय तक चलने वाले पारंपरिक उत्सवों में गिना जाता है। इसकी धार्मिक और सांस्कृतिक विशेषताएं देश के अन्य क्षेत्रों में मनाए जाने वाले दशहरा उत्सव से अलग हैं। यहां मां दंतेश्वरी की आराधना के साथ जनजातीय रीति-रिवाजों और सामुदायिक सहभागिता का विशेष महत्व है।

मुरिया दरबार इसी उत्सव की प्रमुख परंपराओं में शामिल है। इस आयोजन में पारंपरिक प्रतिनिधि स्थानीय समाज से जुड़े विषयों और सामुदायिक समस्याओं को सामने रखते हैं। यह परंपरा बस्तर की ऐतिहासिक पहचान और सामाजिक संरचना को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम है।

राष्ट्रपति की मौजूदगी से इस आयोजन को राष्ट्रीय स्तर पर नई चर्चा और पहचान मिलने की संभावना है।

श्रमदान से शिक्षा और स्वास्थ्य तक, बदलती प्राथमिकताओं की कहानी

बस्तर में राष्ट्रपतियों के दौरों का ऐतिहासिक क्रम क्षेत्र की जरूरतों और विकास की प्राथमिकताओं को समझने का अवसर देता है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद के दौरे में सामुदायिक सहयोग और ग्रामीण विकास का संदेश प्रमुख था। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने शिक्षा और वैज्ञानिक सोच को महत्व दिया। प्रतिभा पाटिल की यात्रा ने पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण की संभावनाओं को सामने रखा, जबकि रामनाथ कोविंद के दौरे में स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा से जुड़े प्रयास महत्वपूर्ण रहे।

अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के दौरे में जनजातीय संस्कृति, पारंपरिक संस्थाओं और स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर विशेष ध्यान है।

इन यात्राओं को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि बस्तर की प्रगति केवल बुनियादी सुविधाओं के विस्तार तक सीमित नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आर्थिक अवसरों के साथ स्थानीय संस्कृति तथा पारंपरिक पहचान का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है।

प्रधानमंत्रियों का भी बस्तर से रहा जुड़ाव

राष्ट्रपतियों के अलावा देश के कई प्रधानमंत्रियों ने भी अलग-अलग समय पर बस्तर का दौरा किया है। पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक, राष्ट्रीय नेतृत्व के बस्तर प्रवास का संबंध क्षेत्र की विकास संबंधी जरूरतों, जनजातीय समाज और प्रशासनिक प्राथमिकताओं से रहा है।

बस्तर का महत्व इसकी प्राकृतिक संपदा, सांस्कृतिक विविधता और जनजातीय विरासत से जुड़ा है। राष्ट्रीय नेतृत्व की यात्राएं समय-समय पर इस क्षेत्र की चुनौतियों और संभावनाओं को व्यापक स्तर पर सामने लाने का माध्यम बनी हैं।

राष्ट्रपति मुर्मु के दौरे से क्या हैं उम्मीदें

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का जनजातीय समुदाय से जुड़ाव और मुरिया दरबार जैसे पारंपरिक आयोजन में उनकी भागीदारी इस दौरे को विशेष बनाती है। बस्तर में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, स्थानीय विकास और सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़े विषय महत्वपूर्ण हैं।

मुरिया दरबार पारंपरिक प्रतिनिधियों को अपनी बात रखने का अवसर देता है। ऐसे में राष्ट्रपति की उपस्थिति जनजातीय समाज की परंपराओं और स्थानीय मुद्दों को व्यापक स्तर पर सामने लाने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

बस्तर का इतिहास बताता है कि यहां आने वाले राष्ट्रपतियों ने अलग-अलग समय पर विकास की विभिन्न प्राथमिकताओं को रेखांकित किया है। इस बार भी सबकी निगाहें राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के कार्यक्रम पर रहेंगी। मुरिया दरबार के ऐतिहासिक मंच पर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की उपस्थिति बस्तर की परंपराओं, जनजातीय पहचान और राष्ट्रीय महत्व के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखी जा रही है।

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