
बालोद।जीवनसाथी के निधन के बाद वृद्धावस्था में आर्थिक सहारे की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, लेकिन शासकीय प्रक्रियाओं की जटिलता और जानकारी के अभाव में यही सहारा पाने के लिए किसी को वर्षों तक न्यायालय की चौखट पर संघर्ष करना पड़े, तो यह व्यवस्था के सामने एक गंभीर सवाल खड़ा करता है।
ग्राम – भेंगरी, जिला बालोद निवासी 74 वर्षीय श्रीमती जयंत्री बाई साहू, अपने दिवंगत पति स्वर्गीय समलिया राम साहू की मृत्यु के बाद मिलने वाली पारिवारिक पेंशन के लाभ के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रही थीं। उनके पति शासकीय प्राथमिक शाला में प्रधान पाठक के पद पर कार्यरत थे तथा सेवानिवृत्ति के बाद उन्हें पेंशन प्राप्त होती थी। पति के निधन 2019 में होने के पश्चात पारिवारिक पेंशन प्राप्त करने के लिए आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने तथा उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र प्राप्त होने के बावजूद उन्हें पेंशन का लाभ नहीं मिल पा रहा था। शासकीय अभिलेखों में नामिनी नियुक्त नहीं होने तथा प्रक्रिया की जानकारी के अभाव ने उनकी परेशानी और बढ़ा दी।
इस मामले में विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, बालोद श्री संजय सोनी ने आवेदिका की 74 वर्ष की आयु एवं प्रकरण की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तत्काल पेंशन का लाभ प्रदान करने संबंधी आदेश पारित किया।
प्रकरण में आवेदिका की ओर से *अधिवक्ता श्री भेष कुमार साहू* ने पैरवी की तथा इसे अपना नैतिक दायित्व मानते हुए उन्हें तत्काल न्याय दिलाने के लिए प्रयासरत रहा, इस मामले में कोर्ट स्टॉप की ओर से सराहनीय सहयोग प्रदान किया, जैसे एक मिशन में काम हो रहें हो ।
यह प्रकरण समाज और शासन-प्रशासन दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि **जीवनसाथी के निधन के बाद किसी वृद्ध महिला को अपने ही वैधानिक अधिकार के लिए जीवन के बहुमूल्य वर्ष न्यायालयों के चक्कर काटते हुए नहीं बिताने पड़ने चाहिए।
शासकीय कर्मचारियों को सेवा के दौरान नामिनी एवं पेंशन संबंधी अभिलेख अद्यतन रखने चाहिए, वहीं संबंधित विभागों को भी पात्र आश्रितों के मामलों का संवेदनशीलता और समयबद्धता से निराकरण करना चाहिए।
न्याय केवल आदेश पारित करने तक सीमित न हो, बल्कि जरूरतमंद व्यक्ति को उसका अधिकार समय पर दिलाना भी न्याय का महत्वपूर्ण उद्देश्य होना चाहिए।
समाज के लिए संदेश – देते हुए, अधिवक्ता भेष कुमार साहू ने कहा कि – शासकीय कर्मचारी सेवा के दौरान नामिनी एवं पेंशन संबंधी दस्तावेज अवश्य अद्यतन कराएं, ताकि उनके जीवनसाथी को वृद्धावस्था में अपने अधिकार के लिए संघर्ष न करना पड़े। बुजुर्गों को न्याय नहीं, समय पर उनका अधिकार मिलना चाहिए।








