बाल मधुमेह बीमारी के इलाज के लिए महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं एवं एएनएम को मिली ट्रेनिंग

 

क्षमता संवर्धन में स्वास्थ्य विभाग के साथ यूनिसेफ और एकम फाउंडेशन की रही सहभागिता

सारंगढ़-बिलाईगढ़, 4 अगस्त 2026/बच्चों को टाइप-1 डायबिटीज (बाल मधुमेह) जैसी गंभीर बीमारी से समय पर बचाव और उपचार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जिला स्वास्थ्य विभाग द्वारा यूनिसेफ एवं एकम फाउंडेशन के सहयोग से महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं एवं एएनएम का विशेष प्रशिक्षण आयोजित किया गया। सारंगढ़- बिलाईगढ़ जिले के विकासखंड में आयोजित इस प्रशिक्षण में विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों से 67 महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं एवं एएनएम सहित कुल 80 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) सारंगढ़-बिलाईगढ़ डॉ. पुष्पेंद्र कुमार वैष्णव के मार्गदर्शन में आयोजित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में जिला कार्यक्रम प्रबंधक (डीपीएम) दीपक कुमार धारा, जिला नोडल अधिकारी (एनसीडी) डॉ. रूपेन्द्र कुमार साहू, डीईओ शेखर साहू, जिला प्रबंधक (प्रशिक्षण, मानव संसाधन) ममता जोल्हे, जिला लेखा प्रबंधक मनोज कुमार साहू, ब्लॉक कार्यक्रम प्रबंधक नंदलाल इजारदार तथा एकम फाउंडेशन के प्रतिनिधि उपस्थित रहे।

प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं एवं एएनएम की क्षमता को सशक्त बनाना था, ताकि वे बच्चों में टाइप-1 डायबिटीज के शुरुआती लक्षणों की समय पर पहचान कर उचित परामर्श, शीघ्र जांच, समय पर रेफरल और प्रभावी उपचार सुनिश्चित कर सकें।

विशेषज्ञों ने प्रशिक्षण के दौरान बताया कि बच्चों में अत्यधिक प्यास लगना, अधिक भूख लगना, बार-बार पेशाब आना या बिस्तर गीला करना, तेजी से वजन घटना, अत्यधिक कमजोरी और थकान जैसे लक्षण दिखाई दें तो इसे सामान्य नहीं समझना चाहिए। ऐसे बच्चों को तत्काल निकटतम स्वास्थ्य केंद्र ले जाकर रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) की जांच करानी आवश्यक है।

प्रशिक्षण में टाइप-1 डायबिटीज की सबसे गंभीर आपातकालीन स्थिति डायबिटिक कीटोएसिडोसिस (डीकेए) की पहचान पर भी विशेष जानकारी दी गई। प्रतिभागियों को बताया गया कि यदि बच्चे में तेज या गहरी सांस चलना, लगातार उल्टी, पेट दर्द, अत्यधिक कमजोरी, निर्जलीकरण, सांस से फल जैसी गंध आना अथवा बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें तो उसे बिना देर किए अस्पताल में भर्ती कर उपचार शुरू कराया जाना चाहिए। साथ ही बार-बार संक्रमण से ग्रसित बच्चों में भी मधुमेह की जांच कराने पर जोर दिया गया।

विशेषज्ञों ने समाज में प्रचलित भ्रांतियों को दूर करते हुए स्पष्ट किया कि टाइप-1 डायबिटीज बच्चों में भी हो सकती है और यह झाड़-फूंक या घरेलू उपचार से ठीक होने वाली बीमारी नहीं है। यह एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अग्न्याशय की इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाती है। ऐसे बच्चों को जीवनभर नियमित इंसुलिन उपचार की आवश्यकता होती है।

प्रशिक्षण में यह भी बताया गया कि समय पर पहचान, नियमित इंसुलिन, संतुलित आहार, रक्त शर्करा की नियमित निगरानी और चिकित्सकीय फॉलो-अप के माध्यम से टाइप-1 डायबिटीज से पीड़ित बच्चे भी स्वस्थ, सक्रिय और सामान्य जीवन जी सकते हैं।

कार्यक्रम में यूनिसेफ की ओर से डॉ. गजेंद्र सिंह के नेतृत्व में तकनीकी सहयोग प्रदान किया गया। विशेषज्ञों ने महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं एवं एएनएम से अपने-अपने कार्यक्षेत्र में बाल मधुमेह के प्रति समुदाय, अभिभावकों और परिवारों को जागरूक करने, संभावित मरीजों की शीघ्र पहचान कर उनकी रक्त शर्करा जांच, समय पर उपचार तथा उचित स्वास्थ्य संस्थान में रेफरल सुनिश्चित करने की अपील की। कार्यक्रम के सफल आयोजन में जिला स्वास्थ्य विभाग, यूनिसेफ एवं एकम फाउंडेशन का महत्वपूर्ण सहयोग रहा।

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