79 साल का इंतजार खत्म: बस्तर की धरती पर गूंजी विकास की सीटी, रावघाट पहुंची ट्रेन, ग्रामीणों ने कहा – अब हुई असली दिवाली

नम्रता सिंह की कलम से

रायपुर। कभी लाल आतंक की दहशत, गोलियों की तड़तड़ाहट और सन्नाटे में सिमटा बस्तर, आज विकास की नई पटरी पर दौड़ने को तैयार है। 79 साल के लंबे और पीड़ादायक इंतजार के बाद जब सजी-धजी ट्रेन “TRAIN TO ROWGHAT” के नारों के बीच रावघाट स्टेशन पर पहुंची, तो पूरा बस्तर संभाग भावुक हो उठा।यह सिर्फ एक ट्रेन का पहुंचना नहीं है, यह बस्तर के इतिहास में लिखा गया एक नया अध्याय है। यह उस भरोसे की जीत है, जिसे नक्सलवाद दशकों तक कुचलने की कोशिश करता रहा।

वो दौर, जब सांस लेना भी था मुश्किल

आज की पीढ़ी शायद उस दर्द को महसूस भी न कर सके, जो बस्तर ने झेला है। आजादी के पहले यहां के आदिवासी राजाओं और अंग्रेजों के शोषण में खुली हवा में सांस नहीं ले पाते थे। और विडंबना यह रही कि 1947 में देश आजाद हुआ, लेकिन बस्तर आजाद नहीं हो पाया।लाल आतंक ने बस्तर को ऐसा जकड़ा कि यहां की माताएं अपने बच्चों को घर से बाहर भेजने में घबराती थीं। बच्चे स्कूल जाने से डरते थे। किसान खेत में जाने से कतराते थे। शाम होते ही गांवों में कर्फ्यू जैसा सन्नाटा पसर जाता था। विकास की बात करना भी जैसे गुनाह था।

1940 से 2025 तक: एक अधूरे सपने की कहानी

दल्लीराजहरा से रावघाट तक 95 किमी रेल लाइन का सपना अंग्रेजों के जमाने में देखा गया था। आजादी के बाद कई बार सर्वे हुए, घोषणाएं हुईं, लेकिन दुर्गम पहाड़, घने जंगल और फिर नक्सली हिंसा इस सपने के आड़े आती रही। नक्सलियों ने इस परियोजना को अपना सबसे बड़ा दुश्मन माना। उन्होंने पटरियां उखाड़ीं, पुलिया उड़ाए, मशीनें जलाईं।लेकिन हमारे DRG, बस्तर फाइटर्स, CRPF और कोबरा के वीर जवानों ने अपने लहू से इस धरती को धोया। एक-एक गांव को नक्सल मुक्त कराया। और जब सुरक्षा का घेरा मजबूत हुआ, तभी यह विकास की रेल भी आगे बढ़ पाई। इसलिए यह रेल सिर्फ इंजीनियरों की नहीं, हमारे शहीद जवानों के बलिदान की भी प्रतीक है।

अब बस्तर के लिए क्या बदलेगा?

नारायणपुर, कांकेर और कोण्डागांव के लोगों का दशकों पुराना सपना अब हकीकत है। इस ट्रेन के आने से अब बस्तर का लौह अयस्क सीधे भिलाई स्टील प्लांट जाएगा, जिससे हजारों स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा। अब जगदलपुर-रायपुर का सफर आसान होगा, गंभीर मरीज घंटों बस में तड़पने के बजाय जल्दी बड़े अस्पतालों तक पहुंच सकेंगे। छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए पलायन नहीं करना पड़ेगा और बाहर का सामान सस्ता होने से महंगाई भी कम होगी।कल तक जहां IED लगते थे, आज वहां रेल की पटरियां बिछ रही हैं, इससे बड़ा बदलाव और क्या हो सकता है?

असली दिवाली तो आज है

दिवाली भले ही 20 अक्टूबर को हो, लेकिन बस्तर के लोगों के लिए असली दिवाली तो आज ही है। जब 79 साल बाद उनके गांव में ट्रेन पहुंची है, तो हर घर में खुशी के दिए जल रहे हैं। बुजुर्गों की आंखों में जो आंसू हैं, वह सुकून के हैं। बच्चों की किलकारियों में अब डर नहीं, उम्मीद है।यह नया आयाम है, यह नया इतिहास है। यह बताता है कि अब बस्तर बंदूक की नली से नहीं, विकास की पटरी से पहचाना जाएगा।

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