
छ.ग. के प्रसिद्ध गंभीर पेट रोग विशेषज्ञ डॉ. विनोद सिंह को सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा के लिए विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने किया सम्मानित।
सम्मान प्राप्त करने वाले डॉ. विनोद सिंह उर्मिला हॉस्पिटल भाटागाँव 200 बिस्तर अस्पताल के मेडिकल डायरेक्टर हैं।
डॉ. विनोद सिंह का जीवन केवल एक सफल डॉक्टर बनने की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसे इंसान की यात्रा है जिसने संघर्ष, संवेदनाओं और अपने माता-पिता के सपनों को जीवन का उद्देश्य बना लिया। 13 मार्च 1975 को मध्यप्रदेश के कटनी में एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे डॉ. विनोद सिंह बचपन से ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी रहे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा केंद्रीय विद्यालय, कटनी से सीबीएसई बोर्ड के अंतर्गत हुई। पढ़ाई के साथ-साथ खेल और अनुशासन में भी वे हमेशा आगे रहे। वे दो बार नेशनल स्तर तक स्पोर्ट्स में पहुंचे, बैडमिंटन के स्टेट प्लेयर रहे, प्रेसिडेंट अवार्डेड स्काउट बने और एनसी के ‘बी’ सर्टिफिकेट होल्डर भी रहे।
गांवों में रहकर समझी स्वास्थ्य व्यवस्था
एमबीबीएस के बाद वर्ष 2001 में उन्होंने खड़गवा ब्लॉक, चिरमिरी में ग्रामीण सेवा दी। गांवों में काम करते हुए उन्होंने स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और लोगों की परेशानियों को करीब से समझा। वर्ष 2004 में उनका चयन पीजी के लिए हुआ और 2007 तक उच्च चिकित्सा शिक्षा पूरी की। इसके बाद दिल्ली में लेप्रोस्कोपिक सर्जरी की विशेष ट्रेनिंग लेकर आधुनिक सर्जरी तकनीकों में विशेषज्ञता हासिल की।
असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर करियर की शुरुआत
मार्च 2008 में उन्होंने मेकाहारा मेडिकल कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में करियर शुरू किया। उस समय लेप्रोस्कोपी सर्जरी के केस कम होते थे, लेकिन मेहनत और लगन से उन्होंने इस क्षेत्र में अलग पहचान बनाई। वे अपने उपकरणों के साथ विभिन्न अस्पतालों में जाकर जटिल सर्जरी करते थे। बाद में रिम्स मेडिकल कॉलेज सहित कई संस्थानों में डायरेक्टर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर की जिम्मेदारियां निभाईं। वर्तमान में वे एक मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में सेवाएं भी दे रहे हैं।
भावनात्मक सोच ने दिया नया मुकाम
डॉ. विनोद मानते हैं कि डॉक्टर केवल इलाज नहीं करता, बल्कि किसी परिवार की उम्मीद भी बचाता है। मेडिकल कॉलेज के दिनों में एक गरीब नवजात बच्ची, जिसकी जन्मजात जटिल समस्या थी, के इलाज के लिए उन्होंने अपना स्टाइपेंड तक खर्च कर दिया था। आज वही बच्ची स्वस्थ जीवन जी रही है। इसी तरह कैंसर से जूझ रही एक किशोरी की जिंदगी बचाना भी उनके जीवन के सबसे भावनात्मक अनुभवों में से एक है।
‘नम्रता’ बनी प्रेरणा
डॉ. विनोद सिंह ने बताया कि 30 बिस्तर से 200 बिस्तर अस्पताल तक पहुंचने की सफलता के पीछे उनकी पूरी पैरामेडिकल टीम के साथ उनकी पत्नी नम्रता सिंह ने हर कदम पर मजबूती से उनका साथ दिया। तो वहीं डॉ. विनोद के सोच के अनुरूप उर्मिला फाउंडेशन की स्थापना की जिसके अंतर्गत आज भी अनेको एंडोस्कोपी, फाइब्रोस्कैन जैसी अनेकों महंगी जांच जरूरत मंदों के लिए नि:शुल्क आयोजित की जाती है।







