बस्तर पंडुम पर सियासत तेज, सरकार ने बताया सांस्कृतिक गौरव तो कांग्रेस ने करोड़ों खर्च पर उठाए सवाल

 रायपुर। बस्तर पंडुम को लेकर छत्तीसगढ़ की राजनीति गरमा गई है। एक ओर राज्य सरकार इसे बस्तर की जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का बड़ा अभियान बता रही है, वहीं कांग्रेस ने इस आयोजन को राजनीतिक प्रचार करार देते हुए करोड़ों रुपये खर्च करने पर सवाल उठाए हैं।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने रायपुर स्थित राजीव भवन में आयोजित प्रेसवार्ता में आरोप लगाया कि भाजपा सरकार ने बस्तर पंडुम जैसी पारंपरिक आदिवासी सांस्कृतिक परंपरा को अपने राजनीतिक कार्यक्रम में बदल दिया है। उन्होंने कहा कि बस्तर पंडुम के नाम पर राष्ट्रपति और केंद्रीय गृह मंत्री की मौजूदगी वाले कार्यक्रम में करीब 6 करोड़ 14 लाख 78 हजार 943 रुपये खर्च किए गए, जबकि यह राशि आदिवासियों के विकास, रोजगार, शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं पर खर्च की जा सकती थी।

बैज ने कहा कि बस्तर के कई गांव आज भी सड़क, पुल, बिजली और पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बोधघाट परियोजना के नाम पर 56 गांवों को उजाड़ने की तैयारी की जा रही है। साथ ही नक्सल मुक्त गांवों को एक-एक करोड़ रुपये देने के वादे और डीएमएफ तथा सीएसआर फंड के उपयोग पर भी सरकार को घेरा।

दूसरी ओर, राज्य सरकार बस्तर पंडुम को जनजातीय संस्कृति के सम्मान और संरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक पहल बता रही है। हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के अनुरोध पर भविष्य में बस्तर दशहरा और बस्तर पंडुम में शामिल होने की इच्छा जताई थी। राष्ट्रपति ने बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को भारत की अमूल्य धरोहर बताते हुए उसके संरक्षण और व्यापक पहचान की आवश्यकता पर जोर दिया।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने राष्ट्रपति द्वारा बस्तर के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात को पूरे छत्तीसगढ़ के लिए गर्व का क्षण बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति का बस्तर आने का निमंत्रण स्वीकार करना प्रदेश की जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण साबित होगा।

बस्तर पंडुम को लेकर अब राजनीतिक बहस तेज हो गई है। जहां सरकार इसे सांस्कृतिक गौरव और आदिवासी परंपराओं के सम्मान का प्रतीक बता रही है, वहीं कांग्रेस का कहना है कि संस्कृति के नाम पर विकास के मूल मुद्दों से ध्यान भटकाया जा रहा है। ऐसे में यह मुद्दा आने वाले दिनों में प्रदेश की राजनीति में और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।

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